Class 8th science ncert ch-7 (किशोरावस्था की ओर) notes pdf download

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7. किशोरावस्था की ओर

  • किशोरावस्था- जीवन काल की वह अवधि जब शरीर अपने अंगों को विकसित करता है। वह अवस्था किशोरावस्था कहलाती है। यह अवधि लगभग 11 वर्ष की आयु से प्रारंभ होती है और 18 या 19 वर्ष की आयु तक रहती है। लड़कियों में यह अवस्था लड़कों की तुलना में 1 या 2 वर्ष पहले ही प्रारंभ हो जाती है। किशोरावस्था

यौवनारंभ में होने वाले परिवर्तन-

  1.  लंबाई में वृद्धि होनी शुरू हो जाती है।
  2. शरीर की आकृति में बदलाव आना शुरू हो जाता है। 
  3. स्वर में परिवर्तन हो जाता है। लड़कों के अंदर ऐडम्स एप्पल उभरकर बाहर आ जाता है और लड़कियों की आवाज और तेज हो जाती हैं।
  4. जनन अंगों का विकास हो जाता है। लड़कियों में अंडाशय के आकार में वृद्धि हो जाती हैं।
  5. लड़कों को दाढ़ी मूछ आने लग जाती हैं। 
  6. यौवनारंभ के साथ ही वृषण टेस्टोस्टेरोन या पुरुष हार्मोन का प्रारंभ हो जाता है। लड़कियों में अंडाशय एस्ट्रोजन या स्त्री हार्मोन बनना शुरू हो जाता है

स्त्रियों में जनन अवस्था का प्रारंभ 10 से 12 वर्ष की आयु से हो जाता है और यह सामान्यतः 45 से 50 वर्ष की आयु तक चलता रहता है।

  • ऋतुस्त्राव – अंडाशय में जब अंडाणु बनते हैं तब वह अंडाणु माता के शरीर में 28 से 30 दिन तक रहता है। अगर वह निषेचन नहीं करता तो वह फूट जाता है और शरीर से बाहर निकलता है। इससे स्त्रियों में रक्त स्त्राव होता है। जिसे रजोधर्म या ऋतुस्त्राव कहते हैं।

संतान का लिंग निर्धारण-

लिंग निर्धारण में गुणसूत्रों की अहम भूमिका होती है। पुरुष के पास XY गुणसूत्र होते हैं जबकि माता के पास XX गुणसूत्र होते हैं। जब माता गुणसूत्र पुरुष गुणसूत्रों से मिलते हैं यानी कि जब शुक्राणु अंडाणु से मिलते हैं तो निषेचन होता है। इस निषेचन के दौरान अगर पुरुष का x गुणसूत्र माता के गुणसूत्रों से मिलता है तो वह लड़की होगी। जबकि अगर पुरुष का Y गुणसूत्र माता के X गुणसूत्र से मिलता है। तो उस समय संतान लड़का होगा। नीचे की फोटो को देखकर आप इसे और भी बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

संतान का लिंग निर्धारण

  • हार्मोन- हमारे शरीर में बहुत सारी क्रियाएं चलती हैं। उन्हीं में से बहुत सारी ग्रंथियां अलग-अलग हार्मोन उत्पन्न करती हैं। जो हमारे शरीर में अलग-अलग कार्य करते हैं। चलिए जानते हैं कुछ महत्वपूर्ण हार्मोनो के बारे में।

  1. पीयूष ग्रंथि- यह ग्रंथियां हमारे शरीर की वृद्धि को नियंत्रित करती हैं। पीयूष ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन को वृद्धि हार्मोन कहते हैं। यह ग्रंथि हमारे मस्तिष्क में पाई जाती हैं। इस ग्रंथि के सही से काम ना करने पर लंबाई या तो ज्यादा बढ़ जाती है या फिर नहीं बढ़ती। 
  2. थायराइड ग्रंथि- यह ग्रंथि हमारे गले में पाई जाती हैं। यह हमारी आवाज को संतुलित करने का काम करती है। इस ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन को थायरोक्सिन कहते हैं। इस ग्रंथि के काम न करने पर गायटर नामक रोग हो जाता है। जिससे हमारा गला फूल जाता है। 
  3. एड्रिनल ग्रंथि- यह ग्रंथि हमारे पेट के हिस्से में पाई जाती है। इस ग्रंथि से एड्रिनेलिन नामक हार्मोन बनता है। जो हमारे शरीर के क्रोध, चिंता और उत्तेजना को संतुलित करता है। 
  4. अग्न्याशय- यह हार्मोन भी हमारे पेट के हिस्से में पाया जाता है। इससे इंसुलिन नामक हार्मोन उत्पन्न होता है। जो हमारे शरीर में खाने को पचाने में सहायक होता है। इसकी वजह से डायबिटीज नामक बीमारी हो जाती है।
  5. अंडाशय – यह स्त्री संबंधी अंग है। इससे एस्ट्रोजन नामक हार्मोन उत्पन्न होता है।
  6. वृषण – यह पुरुष संबंधी अंग है। इससे टेस्टोस्टेरोन हार्मोन उत्पन्न होता है।
  7. कीट और मेंढक के अंदर कायांतरण होता है। कायांतरण का मतलब है। लारवा से व्यस्त बनने का परिवर्तन। इसके दौरान कीट कीट हार्मोन उत्पन्न करते हैं।


किशोर की पोषण आवश्यकताएं-

हमारा शरीर बहुत सारी कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। हर कोशिका अलग-अलग कार्य करती है। किशोरावस्था के दौरान शरीर की तेजी से वृद्धि होती है। इस वृद्धि में शरीर को एक अच्छे आहार की जरूरत होती है। जिसे हम संतुलित आहार कहते हैं। संतुलित आहार में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन और खनिज का पर्याप्त मात्रा में समावेश जरूरी है। दूध अपने आप में एक संतुलित आहार है। इस दौरान हमें एक अच्छे आहार के साथ-साथ शारीरिक व्यायाम की भी जरूरत पड़ती है। ताकि शरीर के सभी अंग सही से काम करते रहें।

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